सखियाँ मनुहारि कै हारि

Raskhan

सखियाँ मनुहारि कै हारि रही भृकुटी को न छोर लली नचयी ।
चहुँधा घनघोर नयौ उनयौ* नभ नायक ओर चितै चितयौ ॥
विकि आप गई हिय मोल लियौ रसखान हितू न हियों रिझयौ ।
सिगरो दुख तीछन कोरि कटाछन काटि के सौतिन बाँटि दियौ ॥२०१॥