सखि गोधन गावत हो

Raskhan

सखि गोधन गावत हो इक ग्वार लख्यौ वहि डार गहे वट की ।
अलकावलि राजति भाल बिसाल लसैं वनमाल हिये टटकी ।
जव तैं वह तानि लगी रसखानि निवारै को या मग हौं भटकी ।
लटकी लट मों दृग-मीननि सों बनसी जियवा नट की अटकी ॥१७२॥