सब धीरज क्यों न

Raskhan

सब धीरज क्यों न धरौ सजनी पिय तो तुम सों अनुरागेइगौ ।
जव जोग सँजोग को आन बनै तब जोग विजोग को मानेइगौ ॥
निसचै निरधार धरौ जिय में रसखान सबै रस पावेइगौ ।
जिनके मन सो मन लागि रहै जिनके तन सों तन लागेइगौ ॥१९२॥