साँझ समैं जिहि देखत

Raskhan

साँझ समैं जिहि देखत ही तिहि पेखन को मन यों ललकै री* ।
ऊँचे अटान चढ़ी व्रज बाल सलाज सनेह दुरै उझकै री ।
गोधन धूर की धूँधरी में तिनकी छवि यों रसखान तकैं री ।
पावक के गिरि तैं बुझि मानो धुआँ लपटें लपटें लपकैं री ॥२४२॥