सास की सासन* ही

Raskhan

सास की सासन* ही चलिवौ चलियै निसि द्यौस चलावै जिही ढंग ।
आली चवाव लुगाइन केर जातन ये ननदी ननदौ सँग ।
भावती औ अनभावती* भीर मैं छुवै न गयौ कबहूँ अँग सो अँग ।
बैर करें घर ही में तवै रसखानि सों मोसों कहा भयो रँग ॥२४१॥