सुन री पिय मोहन

Raskhan

सुन री पिय मोहन की बतियाँ अति ढीठ भयो नहिं कानि करै ।
निसि वासर औसर* देत नहीं छिनहीं छिन द्वारेही आनि अरै ॥
निकसौ मति नागरि डौंड़ी बजी ब्रजमण्डल मैं इह कौन भरै ।
अब रूप की रौर परी रसखानि रहै तिय कोऊ न माँझ घरै ॥१५॥