सोई हैं रास में

Raskhan

सोई हैं रास में नैसुक* नाचिकैं नाच नचाये कितै सबको जिन ।
सोई है रीं रसखान इहै मनुहार* हू सूधे चितौत नहीं छिन ॥
तोमें धौं कौन मनोहर भाव बिलोकि भयो बस हाहा करी तिन ।
औसर ऐसो मिलै न मिलै फिर लंगर मोड़ो कनौड़ो करै किन ॥१३३॥