हैं छल की अप्रतीत

Raskhan

हैं छल की अप्रतीत की मूरति मोद बढ़ावै विनोद कलाम में ।
हाथ न ऐहै कछू रसखान तू क्यों वहकै विष पीवत काम में ।
है कुछ कंचन के कलसा न ये आम की गाँठ मढ़ी ककि चाम में ।
वैनी नहीं मृगनैनिन की ये नसैनी लगी जमराज के धाम में ॥१५८॥