होती जु पै कुबरी

Raskhan

होती जु पै कुबरी ह्यौं सखी भरि लातन मूका बकोटती केती ।
लेती निकाल हिए की सबै नक छेदि कै कौड़ी पिराइ कैं देती ॥
ऐती नचाइ कै नाच वा राँड़ को लाल रिझावन की फल पेती ।
सेती सदाँ रसखानि लिए कुबरी के करेजनि सूल सी भेंती ॥९६॥