काय बचो मन ते बसी
काय बचो मन ते बसी हौं जिय संग निकारइ जो कछु तेरे ।
हाथ के माथे धरे कुच संभु के काय के सौंह को देत सबेरे।
नाभि के कुंड में सोरी के सौंह को मो मन हौं रसलीन जो तेरे ।
बात की जा परतीति नही मुख को ए धरो अब जीभ में मेरे ॥
काय बचो मन ते बसी हौं जिय संग निकारइ जो कछु तेरे ।
हाथ के माथे धरे कुच संभु के काय के सौंह को देत सबेरे।
नाभि के कुंड में सोरी के सौंह को मो मन हौं रसलीन जो तेरे ।
बात की जा परतीति नही मुख को ए धरो अब जीभ में मेरे ॥