पद्माकर (1753–1833) ब्रजभाषा के प्रसिद्ध कवि थे और हिंदी साहित्य के रीति काल के प्रमुख प्रतिनिधियों में गिने जाते हैं। उनका जन्म बुंदेलखंड क्षेत्र में हुआ और वे विभिन्न राजदरबारों से जुड़े रहे, जहाँ उन्हें कवि के रूप में विशेष सम्मान प्राप्त हुआ। उनकी काव्यप्रतिभा के कारण वे अपने समय के प्रतिष्ठित दरबारी कवियों में सम्मिलित थे।
पद्माकर की रचनाओं में अलंकारिकता, रसात्मकता और काव्यशिल्प की परिपक्वता स्पष्ट दिखाई देती है। उन्होंने ब्रजभाषा में वीर रस, श्रृंगार रस और राजकीय वैभव का अत्यंत सजीव चित्रण किया। उनके काव्य में दरबारी संस्कृति, युद्धों का वर्णन, तथा राजाओं के यशगान के साथ-साथ प्रकृति और मानवीय भावनाओं का भी सुंदर समन्वय मिलता है।
उनकी प्रमुख कृतियों में जगद्विनोद, हिम्मत बहादुर विरुदावली और रासपंचाध्यायी उल्लेखनीय हैं। इन रचनाओं में उनकी भाषा की मधुरता, अलंकारों की विविधता और वर्णन की प्रभावशीलता विशेष रूप से प्रशंसित रही है।
पद्माकर का काव्य ब्रजभाषा की उस समृद्ध परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है जिसमें काव्यकला, अलंकार और भावप्रवणता का अद्भुत मेल मिलता है। हिंदी साहित्य के इतिहास में वे एक ऐसे कवि के रूप में स्मरण किए जाते हैं जिन्होंने रीति कालीन काव्यशैली को अत्यंत परिष्कृत और प्रभावशाली रूप प्रदान किया।