
रसखान (लगभग 16वीं शताब्दी) भक्तिकाल के अद्वितीय कवि थे, जो मुस्लिम परिवार में जन्म लेकर भी श्रीकृष्ण की अनन्य भक्ति में लीन हो गए। उनका वास्तविक नाम सैयद इब्राहीम माना जाता है। उनका जीवन इस सत्य का सजीव उदाहरण है कि प्रेम और भक्ति किसी जाति, धर्म या संप्रदाय की सीमाओं में बंधे नहीं होते।
रसखान ने ब्रजभाषा में श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं, वृंदावन की रमणीयता और गोप-गोपियों के सहज प्रेम का अत्यंत कोमल और सरस चित्रण किया। उनकी प्रमुख कृतियों में सुजान रसखान और प्रेमवाटिका उल्लेखनीय हैं। उनकी कविता में माधुर्य-भाव, वात्सल्य और दार्शनिक गहराई का सुंदर समन्वय मिलता है।
रसखान की प्रसिद्ध पंक्तियाँ—“मानुस हौं तो वही रसखान…"—उनकी कृष्ण-प्रेम में पूर्ण समर्पण की झलक देती हैं। वे भारतीय भक्ति-साहित्य में सांस्कृतिक समन्वय और प्रेम की सार्वभौमिकता के प्रतीक माने जाते हैं।
Raskhan की संपूर्ण रचनाएँ Works of Raskhan
सवैया
208अँखियाँ अँखियाँ सों सकाय
अंग ही अंग जराव
अंगनि अंग मिलाय दोऊ
अंजन मंजन* त्यागौ अली
अति लाल गुलालहु फूलत
अति लोक की लाज
अति सुन्दर री ब्रजराजकुमार
अलबेली विलोकनि बोलनि औ
आई सबै व्रज-गोप लली
आज अचानक राधिका रूपनिधानि
आज गई व्रजराज के
आज भटू मुरली बरु
आज महूँ दधि बेचन
आजु गई हुती भोरही
आजु सँवारति नेक भटू*
आजु' सखी नँदनन्दन री
आयो हुतो नियरें रसखानि
आली पगे जु रँगे
आली लला घन सों
आवत लाल गुपाल लिए
आवत हैं बन तैं
इक ओर किरीट लसै*
उनहीं के सनेहन सानी
ए सजनी जब तैं
ए सजनी मनमोहन नागर
एक तैं एक लौं
एक समै इक लालनि
एक समैं जमुनाजल में
एक समै मुरली धुनि
एक सु तीरथ डोलत
औचक दृष्टि परै कहूँ
कंचन मन्दिर ऊँचे बनाइकै
कल कानन कुण्डल मोरपखा
कला निज कोटी ।
कंस कुढ्यौ सुनि बानी
कंस के क्रोध' की
काटे लटे की लटी
कातिक क्वार के प्रात
कान परे मृदु वैन
कान्ह भए बस बाँसुरी
काल्हि पर्यो मुरली धुनि
काल्हि भटू मुरली धुनि
काह कहूँ रतियाँ की
काहू कहूँ सजनी सँग
काहू को माखन चाखि
काहूसों माई कहा कहिए'
काहे कूँ जाति जसोमति
कीजै कहा जु पै
कुंजगली मैं अली निकसी
कुंजनि कुंजनि गुंज के
केसरिया पट, केसरि खौर*
कैसो मनोहर बानक मोहन
को रिझवारिन कों रसखानि
कोई है रास मैं
कौन की नागरि रूपकी
कौन को लाल सलोनो
कौन ठगौरी* भरी हरि
खंजन मीन सरोजन को
खेलत फाग सुहाग भरी
खेलिये फाग निसंक ह्वै
खेलै अलीजन* के गन
गावैं गुनी गनिका* गन्धर्ब*
गुंजरें सिर मोरपखा अरु
गोकुल के बिछुरे को
गोकुल नाथ बियोग प्रलै
ग्वालिन द्वै क भुआन
घर ही घर घेरु
चंद सों आनन मैन-मनोहर
चंदन खोर पै बिन्दु
छीर जो चाहत चीर
जग कान्ह भये बस
जमुना-तट वी गई जब
जा दिन तें मुसिकानि
जा दिन तैं निरख्यो
जाको लसै मुख चन्द
जात हुती* जमुना जल
जानत हौं न कछू
जानै कहा हम मूढ़
जाहु न कोऊ सखी
जो कवहूँ मग पाँव
जो रसना* रस ना
जोग सिखावत आवत है
डोरि लियौ मन मोरि
ता' जसुदा कह्यौ धेनु
तीरथ भीर में भूलि
तुम चाहो कहौ सो
तू मरवाइ* कहा झगरै
तेरी गली में जा
दमकैं रवि कुंडल दामिनी
दानी भए नए माँगत
दूर तें आइ दुरैहौं
दृग दूने खिंचे रहैं
देखत सेज विछी ही
देखन कौं सखी नैन
देखिकैं रास महावन को
देखिहौं आँखिन सों पिय
देस बिदेस के देखे
दोउ कानन कुण्डल मोरपखा
द्रौपदी औ गनिका गज
धूर भरे अति शोभित
नन्द को नन्दन है
नवरंग अनंग भरी छबि
नागर छैलहि गोकुल मैं
नैन मनोहर बैन बजै
नैननि बंकनि साल के
पहिले दधि लै गई
पिय सों तुम मान
प्यारी के चारु सिंगारु
प्यारी पै जाइ कितौ
प्रान वही जु रहैं
प्रेम कथानि की बात
प्रेम पगे जू रँगे
प्रेम मरोरि उठै तत्र
फागुन लाग्यो सखी जब
बंक बिलोकनि है दुखमोचन
बनें कान कुंडल मोरपखा
बंसी बजावत आनि कढ़ो
बाँकी धरें कलगी सिर
बाँकी बड़ी अँखियाँ बड़रारे'
बाँकी बिलोकनि रंग भरी
बाँकी मरोर गही भृकुटीन
बागन काहे को जाओ
बिहरें पिय प्यारी सनेह
बेनु बजावत गावन गावत
बैद की औषधि खाइ
बैन वही उनको गुन
बैरिन तो बरजी न
ब्रज की वनिता सव
ब्रह्मा मैं ढूँढ़्यो पुरानन
भई वावरी ढूँढ़ति वाहि
भटू सुन्दर स्याम सिरोमनि
भेती* जु पै कुवरी
भौंह भरी वरुनी सुथरी
मग हैरत धूँधरे नैन
मान की औधि है
मानुष हौं तो वही
मारग रोकि रह्यौ रसखानि
मेजं मनोहर मूरि लखै
मेरो सुभाव चितैवे कों
मैं रसखान की खेलनि
मैन मनोहर बैन बजै
मैन मनोहर बैन बड़े
मैन मनोहर री दुखदंदन
मो मन मोहन कों
मोतिन माल वनी लटकैं
मोर किरीट नवीन लसै
मोर के चंदन मौर
मोरपखा धरें चारिक चारु
मोरपखा मुरली बनमाल लख्यो'
मोरपखा सिर ऊपर राखिहौं
मोरपखा सिर काननि कुंडल
मोहन के मन की
मोहन के मन भाइ
मोहन को मुरली सुनिकै
मोहन जू के वियोग
मोहन रूप छकी वन
मोहन सों अटक्यौ मनु
मोहिनी मोहन सों रसखानि
यह गोधन* गावत गोधन
यह देख धतूरे के
या' लकुटी अरु कामरिया
रसखानि यहै सुनि कै
रसखानि सुन्यो है वियोग
लंगर छैलहि गोकुल मैं
लाज के लेप चढ़ाइ
लाड़िली* लाल लसैं लखिये
लाय समाधि रहे वरम्हादिक
लाल की आज छठी
लाल लसै पगिया सबके
लीने अबीर भरे पिचका
लुगाई सबै व्रज माँहि
लोक की लाज तजी
लोग कहैं ब्रज के
वन वाग तड़ागनि कुंजगली
वह घंरनि धेनु अबेर
वह देखि धतूरे के
वह साँवरों नंद' को
वह सोई हुती परजंक
वा मुख की मुसकानि
वा रसखानि गुनों* सुनि
वागन में मुरली रसखान
वात चलै चमकै दुति
वात सुनी न कहूँ
वारति* जा पर ज्यों
वारहीं* गोरस बेंचि री
वृषभान के गेह दिवारी
शंकर से सुर जाहि
श्री वृषभान की छान*
श्रीमुख यों न बखान
सखि गोधन गावत हो
सखियाँ मनुहारि कै हारि
संपति सों सकुचाइ कुबेरहिं
सब धीरज क्यों न
साँझ समैं जिहि देखत
सार की सारी सो
सास की सासन* ही
सुधि होत बिदा नर
सुन री पिय मोहन
सुनिये सब को कहिये
सुन्दर स्याम सिरोमनि मोहन
सेस गनेस महेस दिनेस
सेस सुरेस* दिनेस* गनेस
सोई हुती पिय की
सोई हैं रास में
सोहत है चंदवा सिर
हैं छल की अप्रतीत
होती जु पै कुबरी
मानुस हौं तो वही रसखान
Krishna